कर्म योग का आचरण किस तरह से ?- How to Perform Our Duties ?

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || ३-7|| कर्मयोग भगवद गीता का महान उपदेश है. कर्म के बिना कोई जीवन जी नही शकता ऐसा भगवान ने भगवद गीता में कहा. क्यों ? इन

किस तरह से हम कार्य करते हुवे भी उपर उठे-Bhagavad Gita: Chapter 5, Verse 7

आज के समय में ज्ञान की बाते थोड़ी बड़ी लगेगी लेकिन एक स्टेज प्राप्त करने के लिए जहा हम प्रशन्नता से कार्य भी कर शके और उनसे स्वतंत्र भी रह शके ऐसा ये श्लोक है

Bhagavad Gita: Chapter 4, Verse 37-यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन

किस तरह से हमारे कर्म अपने संस्कारो के साथ नष्ट होते है. यह बात भगवद गीता हमे शिखाती है. कोई भी कर्म ऐसा नही है जो अपनी छाप न छोड़े यही बात हमे कभी कभी परेशान करके रख देती है. क्योकि बुरी आदते हमे धीरे धीरे और भी निचे गिरा देती है

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन-karmanye vadhikaraste shlok

प्रथम द्रष्टि में तो ये इतना ही समज आ शकेगा की यहा पर केवल इतना कहा गया है की कर्म करते रहो लेकिन फल के बारेमे न सोचो लेकिन यहा पर इनसे ज्यादा बहुत कुछ समजाय गया है. निचे दिए गये point का आप अभ्यास करेगे तो मालूम होगा की ये कर्म को सफल करने की तरकीब है