आखिर क्या है साधना का राज ?-What Is Spiritual Awakening

मनुष्य इस ब्रह्मांड का एक ऐसा लोता प्राणी है जिनके पास बुध्धि है. वह अपनी बुध्धि का इस्तमाल करके अपनी स्थिति के बारेमे सोच शकता है. उन्हें सुधार शकता है. उनका जो आजका जीवन है.. क्या उनसे उपर की कोई स्थिति है !! यह सोच शकता है.

कौनसी बात करे तो जीवन बहेतर बन पाए ये कर शकता है. अगर वह करना चाहे तो !! जो problems उनके सामने आते है उनको किस तरह से सुलझाये और क्या करे की फिर से ये न आये !! अपने वर्तमान जीवन से उपर कोई स्थिति पाई जा शकती है ये भी सोच शकता है. अपनी मर्यादाओ को पहचान कर वह उसे एक opportunity में बदल शकता है.

अध्यात्म का वर्तमान उपोयोग ?- what is real use of spirituality in modern time

आज modern spirituality का समय आ गया है. उनके बारेमे काफी सारे philosopher आगे आये है. वह अपनी ज्ञान की गठरी खोल रहे है लेकिन उनको एक सैध्धान्तिक तरीके से नही दर्शाया है. इस ब्लॉग और हमारी चेनल के माध्यम से हम ये करने की कोशिस करते रहते है.

सामान्य रूप से तो spirituality का use निवृति ज्ञान के लिए होता है. लेकिन प्राचीन वैदिक समय में राजाओं महाराजाओं अपने राज्य को बहेतर तरीके से चलाने के लिए और अपने जीवन में उच्च मूल्यों को स्थापित करने के लिए उनका उपयोग करते थे.

राजा जनक, दशरथ, भरत, भगवान राम, श्री कृष्ण, और काफी सारे महाराजे उनका उपयोग करते थे !! ये शिखाने के लिए आश्रम थे. वहा राजकुमार अपने जीवन के शुरुआती दौर में रहते थे. गुरु की सेवा करते थे और ये विद्या शिखते थे.

इस ज्ञान का उदबोधन भगवान ने गीता में भी किया है. परमात्मा ने कर्म को इस तरह से करने को कहा की कर्म के साथ साथ उपर भी उठा जाये.

इसी लिए भगवान कहते भी है की योग: कर्मसु कौशलम् मतलब की कार्य को कुशलता से करना योग है. आज हम कुछ मुद्दे पर बात करेगे जो जीवन को उपर उठाये. उनके साथ साथ हम यह भी सोचेगे की हमे क्या चाहिए ? और क्या करना है ?

ऐसा ख्याल क्यों आया ?- What is positive spirituality?

जीवनमें बहुत सारी बाते ऐसी होती है की हमे मालूम ही नही होती की यह क्या है ? और समय बीत जाता है !! जो आफते, मुश्किले, विपरीत समय जीवन में आते है, उनके आधार पर बहुत सारे बर्षो के बाद ये कुछ नियमावली बनाई दी गई है. ये अनुभव का नतीजा है.

इसमें नई बात नही लेकिन एक व्यवहारिकता छिपी हुई है..आखिर क्या मानवीय जीवन और उनके अस्तित्व को उपर उठाया जा शकता है ? मतलब की क्या वर्तमान समय हमे आनद और प्रशन्नता का अहेसास हो शकता है.. जो बेड़िया हमें डाली गई है क्या ये दूर हो शकती है हालाकि हमे तो उनके बारेमे मालूम ही नही ?

उनका कोई उकेल है ? या इसी तरह से समय की मार को ही हम सुख और दुःख समजते रहे !! क्या इन सबसे उपर कोई अहेसास है ? शरीर और मन से उपर कोई सत्ता है जो हमे निरंतर आनद दे शके ? इन्ही प्रश्नों के आधार पर ये साधना और ब्रह्मचर्य का उद्भव हुवा है..

आपको क्या चाहिए ?- what is your needs and wants

अगर हम अपने आप से ही पूछे की हमे क्या चाहिए ? तो उनका उत्तर क्या होगा ? सामान्य सूत्र है रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की जरूरत है. इसमें सब कुछ आ जाता है. मतलब की हरेक व्यक्ति को जीवन जीने के लिए, अपने शरीर को टिकाने के लिए ये चाहिए ये शुरूआती जरूरत है.

उनसे आगे अपने जैसे दुसरे जिव उत्पन्न करने की चाह में सादी, sex की इच्छा, सजातीय विजातीय आकर्षण विगेरे आ जाता है. मोजशोख, ऐसो आराम, इन्द्रिय के विषयों को और ज्यादा उत्तेजित करे ऐसी भोग विलास की वस्तुऐ भी वह चाहता है. कितना भी दुखी हो फिर भी बार बार यही करने की उनकी इच्छा हो जाती है.

अगर कोई इनसे उपर उठे तब भी रूतबा status, सन्मान प्राप्त करना, कोई उनको ,मान दे, अपनी एक पहेचान हो, उनका order सब कोई फोलो करे. पैसा धन, बहुत सारी सम्पति प्राप्त करना, use हो या न हो फिर भी वह बहुत सारी सम्पति इकठ्ठी करता रहता है. हमारे ग्रंथो में उसे वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकैषणा कहा गया है.

ये सब जीवन की प्रारंभिक जरूरियात न होते हुवे भी धीरे धीरे एक के बाद एक प्रगट होती जाती है. ये एक झाल है उसे माया भी कहते है. उनके बारेमे जितना सोचो वह उतनी ही ज्यादा विकराल होती जाती है. इतना ही नही बुरे से बुरे कर्म भी कराती है.

जरूरियात के साथ हमे आनंद, प्रशन्नता भी मिले-how to feel happiness in life

लेकिन बात इतनी ही नही हमें ये सब क्यू चाहिए ? जीवन टिकाने के लिए जो है उनसे बहुत ज्यादा हम पाना चाहते है क्यों ? क्योकि हम प्रसन्न रहना चाहते. हमे ख़ुशी चहिये. हमे आनंद चाहिए. हम ऐसा चाहते है की हमारे जीवन में दुःख हो ही नही !!

लेकिन कब असंतोष, ट्रेश, चिंता, भय, उद्वेग, depression आ जाता है हमे मालूम ही नही रहता. मतलब की

हम सुखी, आनंदित और अपने आप को हर हमेंशा प्रशन्न रखना चाहते है. लेकिन धीरे धीरे इन सारी बातो में मन इतना उलझ जाता है की इन सभी विषयों की सुरक्षा और चिंता हम करने लगते है !! यहा तक की उस विषयों के बदले हम अपना सुख चैन भी दाव पर लगा देते है.

केवल तन और मन के आधार पर जिए तो क्या होगा ? Think beyond mind and body

शरीर और मन जो चाहता अगर वही हम करते रहे तो पशुत्व की और आगे बढने में हमे कोई नही रोक शकता ? आप कहेगे ऐसा क्यों होता है ऐसा इसलिए होता है की जो इन्द्रिय हमारी है उनका भोग करते रहना ऐसी ही इच्छा मन में बार बार प्रगट होती है..

इनका कोई माप नही रहता.. यह बात खान पान की हो, या सम्भोग की इच्छा हो, या सत्ता सम्पति और ऐश्चर्य की हो.. ओंर भी ज्यादा..ओर भी ज्यादा के सुर गुजते है और आदमी अतृप्त हो के नंगा नाच करने तक नही रुकता..

यही बात मुश्किलें खड़ी कर देती है क्योकि अगर विवेक नही तो इसमें अपने आप ब्रेक लगती ही नही.. ऐसा क्यों होता है ? बहुत ही आसन है पुनरावर्तित क्रिया करने का जो गुण है और विषयों के प्रति जो लगाव है वही हमे ये सब कराता है..

जो आज किया वह कल करने की इच्छा होने लगती है.. क्योकि आज जो किया है उनके संस्कार भीतर स्टोर है और वही संस्कार फिर से उठते है और कुछ करने के लिए प्रेरित करते है.. दूसरी बात है अधुरप.. यह बहुत ही गहन है..

अगर आप मुझसे लम्बे समय तक जुड़े रहेगे तो आपको धीरे धीरे ये बात समज में आने लगेगी..स्व के अनुभव के बिना जो केवल बाह्य तमाशा देखते रहता है उसे भटकाव आ जाता है.. ये अँधेरा ऐसा है जो सोने से खड़ा हो जाता है और जागने से खत्म हो जाता है..

इनका कोई वजूद नही फिर भी है और दीखता भी है .. उनको झेलना आसान नही.. उनका वेग बहुत ही दुःख दायक और भयावह है.. अगर व्यक्ति को समुचित तरीके से जीना हो, आनंद से जीना हो और उपर उठते हुवे जीना है तो तन और मन को कोई एक मार्ग पर चलाना होगा..

जहा पर ब्रेक भी हो एक्सेलेटर भी हो.. युवा है तो केवल विषय ही चाहिए ऐसी सोच धीरे धीरे युवा के यौवन्त्व को खा जाएगी.. क्योकि उनकी पूरी शकती विषयों की और चली जाएगी. जो इश्वर से शकती मिली है वह शुल्लक बातो में बीत जाएगी.

अगर कोई इनके पीछे सोचे तो कुछ नही है स्त्री के शरीर के बारेमे सोचने वाले उनके शरीर के पीछे देखे तो कुछ हाथ नही आता.. इस तरह से ये एक अज्ञान ही है.. कोई अगर लम्बे समय से विषयों का भोग कर रहा है तो उनके अस्तित्व में कोई सुधार नही आया.. वह तृप्त भी नही हुवा..

बल्कि उनकी सेहत और स्वभाव दोनों बिगड़ता जा रहा है तो ये केवल पागलपन ही तो हुवा न !! अगर उसमे कुछ होता हो तो केवल यही करने से पूर्ण तृप्ति क्यों नही मिलती ? यहा से ही साधना का जन्म होता है modern spirituality से देखे तो हमे रूटीन जीवन इस तरह से जीना है की हमारी यात्रा आनंद और प्रशन्नता से भरपूर हो. हमे प्रत्येक कदम कदम पर तृप्ति का अहेसास हो.

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