क्या आप बार बार नकारात्मक सोचते है ?-Negative thinking in hindi

मित्रो, हंमेश की तरह हम अध्यात्म के साथ कुछ ऐसे विषय पर बात करते है जो आपके जीवन में बेहद जरूरी हो. कोई इन विषयों को गहराई से पढ़े और उन पर थोडा अमल करना शुरू करे तो भी उनके जीवनमे कुछ न कुछ तो नया होगा ही.

क्योकि यहां पर जो जुडाव की बात है वह अपने भीतर की चेतना है. जिनका संबंध परम तत्व के साथ है. जो कुछ अडचने आती है वह हमे उसी दिव्यता से दूर करती है.

प्रसन्न चित और ज्वलंत सफलता मिल शक्ती है अगर हम सकारात्मक रहे. क्यों की positivity हमारे द्वार खोल देती है. हम भीतर के साथ कनेक्ट हो पाते है. ये एक माहोल खड़ा करती है. उस माहोल में बहेतर सोच उभर कर आती है उत्साह और प्रसन्नता सहज होती है.

नकारात्मक ऐक fungus(फूग) की तरह होती है जो mind को कुंठित कर देती है. जिनके कारण हमे नई सोच और प्रेरणादाई ख्याल आते नही उनकी बजाय एक गहरी निराशा की खाय का अहेसास होता है.

यह वही बाधा है जो हमारे जीवन में बार बार रूकावटे पैदा करती है. ऐसी ही एक बाधा है.. रूकावट है जिनका नाम है नकारात्मक सोच negative thinking. हा, आपने ठीक सुना नकारात्मक सोच…!!


नकारात्मक सोच का प्रभाव-Effect of negative thinking

यह वही सोच है जो हमारे जीवन में काफी सारी उपलब्धिओ को बहार आने नही देती. जब कोई भी कार्य शुरू करो की तुरंत ही में ये नही कर पाउगा ! ऐसा सोचना शुरू हो जाता है ! बात ऐसी नही की हम सावचेत न रहे ये भी जरूरी है ! लेकिन पूर्ण रूप से निरुत्साहित करने वाली सोच तो फायदेमंद नही है.

क्योकि ये कोई कार्य करने ही नही देती. हर कार्य में थोडा बहुत जोखम तो होता ही है !! इतना ही नही हमारा जीवन ही अनिश्चितताओं से भरा हुवा है. अगर कोई ये मान के बैठ जाये की में कुछ कर ही नही पाउगा तो कोई भी कार्य की शुरुआत कैसे होगी !

शुरूआत ही नही होगी तो कार्य की सफलता की कोई गुंजाईश ही नही रहेगी ! ऐसे कितने लोग है जो जीवन में कुछ नही कर पाते केवल सोचते ही रहते है. इनके पीछे यही नकारात्मक सोच की आदत जवाबदार हो शकती है.

ये बात हुई कार्य की शुरूआत की लेकिन नकारात्मक सोच का दायरा केवल इतना ही नही है ! जीवन के हर समय ये हमे नुकशान कर शकती है negative thinking इनका प्रभाव बहुत गहरा है. जीवन का आनंद ही यहा पर चला जाता है. कुछ अशुभ घटित होगा ऐसा बार बार सोचते रहने से एक भय का माहौल खड़ा हो जाता है.

आत्मविश्वास डिगमिगाने लगता है. जिसका आत्मविश्वास ही चला गया वो कोईभी कार्य में और जीवन में सफल होने की कोई आशा नही रख पायेगा. उनकी वाणी में शायद शब्द जयादा रहता है. इनके अलावा नही होगा..क्या करेगे..बुरे फंसेगे..हमे सोचना चाहिए..ऐसे ही शब्द बार बार निकलकर आयेगे.

फिर से बता देता हु सावचेत और नकारात्मकता में भेद है. परिस्थिति से सावचेत रहना जरूरी है लेकिन नकारात्मकता एक pattern न बनजाये ये भी हमे ध्यान रखना है.

नकारत्मक सोच का दिमाग पर असर-Effects of negative thinking on the brain

नकारात्मक सोच से mind पर विपरीत असर होती है. उनकी पूरी pattern ही बदल जाती है. हमारा मस्तिष्क एक pattern की तहत कार्य करता है. जो चीज बार बार की जाये उनके संस्कार हमारे चित में जमा होते जाते है. अगर कोई निरंतर अच्छा सोचता रहे तो उनका मस्तिष्क धीरे धीरे इस तरह का बन जायेगा. उसे ऐसे दिव्य विचार ही आयेगे.

लेकिन अगर कोई बार बार नकारात्मकता negative thinking ही उत्पन्न करता रहे उनके बारेमें सोचता रहे तो उनके मस्तिष्क इस प्रकारका बन जाता है फिर किसी भी कार्य में उसे तो ऐसा ही लगने लगता है. उसे तो ये पूरा जीवन एक प्रकार का बोज महसूस होने लगता है. ऐसे मस्तिष्क में कोई उर्जा और जोश से भरपूर सोच की कोई गुजाइश नही रहेगी ! आधुनिक युग में उसे एक प्रकार का मनोरोग कहते है. इस मनोरोग से पीड़ित व्यक्ति एक प्रकार के तनाव में आ जाता है.

नकारत्मक सोच का शरीर पर असर-Effects of negative thinking on the body.

अगर हमारा मस्तिष्क शुष्क और निराश हो गया है तो उनकी असर हमारे शरीर पर पड़ेगी ही ! क्योकि मन से तन जुड़ा हुवा है. जैसा मन वैसा तन. जैसी सोच पालोगे वैसे ही नये कोषों का निर्माण होगा. अगर जो मन से हार गया वह तन से भी हारा !

लंबे समय तक इस तरह की सोच negative thinking करते रहने से शरीर इतना आलस्य से भर जाता है की स्फूर्ति चली जाएगी और केवल जिन्दा है वैसा ही लगेगा. अगर कोई सतत डर के बारेम सोचता रहे तो उनके बीपी पर भी उनका प्रभाव पड़ेगा. heart पर भी उनका प्रभाव पड़ेगा.

उनके nervous system पर भी उनका विपरीत प्रभाव हो शकता है ऐसे लोग कभी कभी बडबडाते रहते है. एक प्रकार का तनाव,अनिंद्रा का अनुभव करते है. ज्यादा नकारात्म सोच रात की निंद्रा को हर लेता है. ऐसी व्यक्ति को रात को भी दुस्वप्न आते है.

रात को सोते समय वह बिच बिच में उठ जाते है उनकी नींद चली जाती है. ये सब heart attack को न्योता देना जैसा है. जो भी हो नकारात्मक सोच का प्रभाव हमारे मन और तन पर बहुत ही विपरीत होता है.

मेरे प्रिय वाचको आप तनाव में न आइये जो हमारे साथ जुड़े है उसे तो अवश्य लाभ होगा !! क्योकि हमारे पास तो अध्यात्म जैसा प्रभावशाली मार्ग है कितनी भी अडचन जीवन में क्यों न हो ये सारी दूर हो जाती है इस उपायसे !!


नकारात्मक सोच कैसे होती है ? क्यों होती है ?- Why negative thoughts come in mind in hindi

नकारात्मक मतलब विपरीत जो कुछ भी हम करते है या बनता है उनके आधार पर एक कल्पना मन ही मन उठती है. खास करके जब अनिश्चितता ज्यादा हो तब तुरंत ही कार्य की निष्फलता के बारेमे मन ही मन सोचने लगना नकारात्मक चिन्तन है.

  1. या कार्य की शुरुआत में जो निराशाजनक विचार आते है वह नकारात्मक चिन्तन है. आजके जमाने में इतनी competition बढ़ गई है की कोई भी कार्य के शुरू में नकारात्मक सोच negative thinking उत्पन्न हो ही जाती है. दुसरे के प्रभाव में आने से ये सोच ज्यादा उत्पन्न होती है. क्योकि में उनके आगे कुछ नही ऐसा सोचना ही नकारात्मक चिन्तन का भाग है.
  2. कई बार यहा पर ऐसा भी होता है की कोई व्यक्ति एक कार्य में निष्फल हो गया तो दिमाग यही निष्फलता को पकड़ कर बैठ जाता है फिर कोई भी कार्य शुरू करने से वह डरने लगता है उसे ऐसा ही लगने लगता है की में अब कभी आगे नही बढ़ पाउगा. यहा पर एक ही बात याद रखनी चाहिए की ऐक बार निष्फल होने से कोई हंमेशा निष्फल नही हो जाता.
  3. यहा पर आत्मविश्वास का आभावभी नकारात्मक चिन्तन के लिए जवाबदार है. अपने आप पर भरोसा न होने से तुरंत ही मनमें में ये नही कर पाउगा यह सोच उमड़ पडती है. परिस्थिति के साथ तुलना करने से भी नकारात्मक सोच उत्पन्न होती है.
  4. क्योकि जैसे ही तुलना करते है की तुरंत अपने आप को उन के मुकाबले कम समजने लगते है और तुरंत ही में सफल नही हो पाउगा ऐसा लगने लगता है.
  5. भुतकाल में अगर कोई विपरीत घटना घटित हुई हो उनकी चोट दिमाग पर काफी हुई हो तो जैसे ही कोई नया कार्य करे की तुरंत हम उसी क्रिया से comparison करने लगते है. फिर उसी के हिसाब से नकारात्मक सोचने लगते है.
  6. लंबे समय तक कोई बात से डरने से और ऐसा चिन्तन करने से एक आदत सी हो जाती है फिर तो कोई भी समय पर तुरंत ही नकारात्मकभाव उठने लगते है. मेने ऐसे कितने लोग देखे है जो बार बार नकारात्मक negative thinking बात ही करते है ये एक आदत हो जाती है.
  7. कभी कभी लोग क्या करते है कीउसे एक बार निष्फलता मिली हो उसे पकड़ कर बैठ जाते है फिर बस ऐसा ही सोचते है की में तब निष्फल हुवा तो आज भी निष्फल ही होउगा. सफलता की आशा ही उनके मनमें नही रहती अगर कोई उसे समजाये तो भी वह अपनी उस निष्फलता को याद करा देता है और फिर आगे सोचना और कोई कार्य करना भी बंद कर देता है.
  8. कोई भी कार्य शुरू हो उनसे पहले कुछ विपरीत ही होगा ऐसा सोचने लगते है. ऐसे लोग दुसरो को भी बाकी नही छोड़ते जहा जाते है वहा अपनी नकारत्मक सोच बिखेरते रहते है. कभी कभी तो दुसरो को भी निराश कर देते है. पूरा माहौल negative thinking का बना लेते है. लंबे समय तक ऐसा करने से लोगो उनसे दूर भागते है. क्योकि निरंतर नकारात्मकता किसीको अच्छी नही लगती.
  9. लंबे समय तक कोई बात से डरने से और ऐसा चिन्तन करने से एक आदत सी हो जाती है फिर तो कोई भी समय पर तुरंत ही नकारात्मकभाव negative thinking उठने लगते है. मेने ऐसे कितने लोग देखे है जो बार बार नकारात्मक बात ही करते है ये एक आदत हो जाती है. कोई भी क्रिया शुरू हो उनसे पहले कुछ विपरीत ही होगा ऐसा सोचने लगते है.

नकारात्मक सोच से छुटकारा कैसे पाए-negative thinking se kaise bache

नकारात्मक सोच के बारेमे तो हमने सोचा लेकिन उनको दूर कैसे करे. ऐसा क्या करे की हमारा जीवन उत्साह से भरपूर हो जाये. रचनात्मक ख्याल हमारे मस्तिष्क में आने लगे. हर कार्य में हम उत्साह से लग जाये.

अध्यात्म से नकारात्मक सोच दूर हो शकती है Spirituality can remove negative thinking

सबसे पहली और बेहद महत्वपूर्ण जो बात है वह है अध्यात्म. अध्यात्म से क्या होगा की हमारे भीतर ज्ञान का प्रकास उत्पन्न होगा जिनसे हमें एक प्रकार की समज उत्पन्न होगी. ध्यान और प्राणायाम से मन में जो कोईभी विपरीत सोच हो वह धीरे धीरे बंध होती जाएगी. इतना ही नही में दिव्य हु और चेतना से भरपूर हु उनका ही अंश हु ये सोचने से ही हमारे भीतर एक दिव्यता प्रगट हो जाती है जो सारे विपरीत और नकारात्मक भाव को दूर करती है.

अध्यात्म के माध्यम से सोचे तो केवल कोई कार्य नही कर शकते यही सोच नकारात्मक सोच नही है किन्तु जो इर्षा, तनाव और काम आदि विषयों है वहभी नकारात्मक सोच के दायरे में आते है. कुल मिलाके जो भी विपरीत हो वह नकारात्मक सोच negative thinking चिन्तन कहा जाता है.

कार्यक्षमता के अभाव के पीछे इसी विपरीत चिन्तन का बड़ा हाथ है. मस्तिष्क अगर इनमे प्रवृत रहेगा तो स्वभाविक है की धीरे धीरे उनकी सोचने की शकती सिकुड़ती जाएगी. हम हमारी चेतना से जितना अलग होते जायेगे उतना हम अपने आप को अपूर्ण महसूस करेगे यही अपूर्णता नकारात्मक सोच के माध्यम से बहार आती है .

अध्यात्म में हमारे भीतर की चेतना से जुड़ने का प्रयास किया जाता है. जिससे हमारी द्रष्टि विशाल होगी जिनके कारण छोटी मोटी बाते हमे ज्यादा तंग नही करेगी. इस तरह से अध्यात्म तो एक बड़ा मार्ग हे ही. फिर भी कुछ उनके सलग्न उपाय हम यह पर सूचित करते है.

आत्मविश्वास रखना-self confidence necessary

आत्मविश्वास रखना ये एक ऐसी बात है जो बेहद जरूरी है. हमे दुसरेसे ज्यादा अपने आप पर भरोसा रखना चाहिए. ये तबही संभव होगा जब हम अपने सोच के पक्के हो. मतलब की हम जो कोई भी कार्य के लिए सोचे वह हमे करना चाहिए केवल सोच सोच कर रह जाने से एक प्रकार का कार्य न करने की वृति घर कर जाती है. फिर तो बस कार्य करने से पहले ही गभरा जाते है.

negative thinking

नजरिया बदलना-change point of view

सोचने का नजरिया बदलने से जो नुकशान कारक या limitation मालूम होती है वह एक तक के रूप में दिखाय देगी. आधा भरा हुवा ग्लास किसी को आधा खाली लगेगा तो किसी को आधा भरा हुवा लगेगा मतलब साफ है की हर स्थिती का आंकलन ही उस स्थिती में हमारी सफलता या निष्फलता का मापदंड है और हम उस स्थिती को किशा दिशा में ले जाते है वह तो इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि जो हर स्थिती में कोई एक chance देखता है वह हर हालमे सकारात्मक सोचता रहता है और उसमे भी अपना कोई हित ही साध लेता है .

Negative thinking वाले लोगो से दूर रहना

एक कहावत तो आपने सुनी होगी की जैसा संग वैसा रंग मतलब की आप किसके साथ चलते फिरते है वह बहुत ही महत्वका है. अगर आपकी सोबत में कोई निराशाजनक व्यक्ति सामेल हो गया है, तो संभलिये क्यों की वह निरंतर आपके दिमाग में नकारात्मक के विचार डालता रहेगा.

तुम यह नही कर पाओगे.!! तुम्हारा काम नही यहा पर.. जैसे बार बार विपरीत विचार ही डालता रहेगा. धीरे धीरे आपका दिमागभी नकारात्मक हो जायेगा. इसलिए उससे दूर रहे. हां यहा एक बात जरुर है की कोई अच्छी सलाह देने वाला भी हो.

लेकिन जो हमेशा नकारात्मक ही सोचता रहता है वह तो अच्छी बात नही है. यहा एक बात महत्व की है की अध्यात्म नकारात्मक नही है. क्योकि ये एक समज है बिन जरूरी अधुरप को दूर करती है.

अन्य जरूरी कुछ उपाय

  1. बहुत ही आसन बात अब में कहने जा रहा हु की आप सोचना बंध कीजिए और करना शुरू कीजिए क्यों की बहुत सोचने से धीरे धीरे नकारात्मक चिन्तन शुरू हो जाता है. क्योकि बार बार सोचने से फायदे के बजाय गेरफायदे ज्यादा नजर आने लगते है.
  2. अपने आप को व्यस्त रखिये अच्छी किताबे या अब तो नेट का जमाना है वीडियो का जमाना है ब्लॉग पढिये या कोई वीडियो को सुनिए.
  3. परमात्मा पर समपर्णभाव रखना. यह उपाय किसी को अलग तरह का लगेगा लेकिन बड़ा कारगत है क्योकि जो प्रकृति पर श्रध्धा रखता है उसे एक प्रकार का विश्वास बैठ जाता है. हर कार्य में वह मेरे साथ है ऐसा सोचने से धीरे धीरे नकारात्मकता दूर होती जाएगी.
  4. कोई एक विचार के घेरे में लम्बे समय तक न फसिये. जब भी नकारात्मक चिन्तन negative thinking प्रगट हो की तुरंत कोई सफल व्यक्ति या कोई दूसरी द्रष्टिसे उसे सोचने का शुरू की जिए.

यह सब धिरे धीरे आजमाने से नकारत्मकता दूर होती जाएगी. अंतमे फिर से कहेता हु की मेरे साथ अध्यात्म में जुड़ जाये धीरे धीरे सब कुछ आसन हो जायेगा और नीरतिशय आनंद की अनुभूति होने लगेगी

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